Yeh-Madhur-Kasak-2
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तीन बुड्डों ने मेरी चूत की सील तोड़ी

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Hindi Sex Stories


यह मधुर कसक-2

चम्पा को चोद लेने के बाद मेरे दिलो दिमाग पर अब गंगा मौसी छाने लगी थी। मेरी अश्लील हरकतों को गंगा भांप गई थी, वो मुझसे बचती रहती थी। पर मैं अपने दिल में मधुर कसक लिये उनके आसपास मण्डराता रहता था। वैसे गंगा मौसी मुझे अभी भी बहुत प्यार करती थी, बस मेरी हरकतों से वो विचलित हो जाती थी। मेरे दिल में गजब की हलचल थी। मुझे पता था कि पहल तो मुझे ही करनी है। वो तो चम्पा थी जिसमें इतना साहस था कि उसने अपने आप को मेरे आगे न्यौछावर कर दिया था। पर हर औरत चम्पा की तरह तो नहीं होती है ना।

अचानक मैंने निर्णय ले लिया कि मुझे ही साहस दिखाना होगा और गंगा मौसी को अपने दिल की बात बतानी होगी, भले ही वो मुझसे पन्द्रह साल बड़ी हो।

पर मना कर दिया तो ?

उंह्ह्ह ! मना तो करेगी ही पर नाराज हो गई तो ?

ना...ना... यह भी नहीं, अगर उन्होंने एक तमाचा मार दिया तो, ओह तमाचा भले ही मार दे ... पर यदि मामा-मामी को कुछ कह दिया तो मैं तो मुख दिखाने लायक भी नहीं रह जाऊंगा। नहीं ... नहीं ... ऐसी कोई बात बड़ों को तो नहीं कहता है ... हां... बहुत हो गया तो एक थप्पड़ मार देगी ? वो तो चलेगा ... बस यही होगा ना कि वो मुझसे बात नहीं करेगी ... अरे हट उसकी मां की भोसड़ी ... ना करे बात। पर बात बन गई तो फिर ... आहा ... बल्ले बल्ले... !!!

मैं उनसे बात करने का मौका ढूंढने लगा। कितनी ही बार मौका मिला भी, पर मेरी हिम्मत ही नहीं हुई कुछ कहने की।

आज तो मौसम भी सुहाना है, मामा-मामी भी शहर गये हुये थे, रात तक आने का था। सो मैंने हिम्मत कर ही डाली...। ... और थप्पड़ खाने को भी तैयार हो गया। मैं कमरे से बाहर निकल आया और गेलेरी में झांक कर मौसी के कमरे की तरफ़ देखा। उनका दरवाजा खुला हुआ था।

मेरे कदम जैसे थम से गये थे, साहस करके मैं मौसी के कमरे तक पहुंच गया। अन्दर झांक कर देखा तो कोई नहीं था। तभी मुझे मौसी की आवाज बाथ रूम से आई। मैंने गंगा को पुकारा तो वो अन्दर से ही बोली,"अभी आई, बस दो मिनट...!"

मैं अन्दर जा कर उनके बिस्तर पर बैठ गया। सच पूछो तो मेरी गाण्ड फ़ट रही थी यह सब करते हुये। दिमाग तो कह रहा था कि ऐसी बेवकूफ़ी मत कर ! पर दिल तो वासना का मारा था, भिखारी था, कह रहा था कि साहस कर, तो तुझे चूत मिलेगी, गंगा जैसा करारा माल मिलेगा। मेरी तो सांसें रुकी जा रही थी। अन्त में मैं घबरा उठा, मेरी गाण्ड फ़टने लगी। मैं उठा और मैंने जैसे ही दरवाजे की ओर कदम बढाये, गंगा बाथरूम से बाहर आ गई।

मैंने उन्हें देखा तो देखता ही रह गया। नहाकर निकली गंगा गजब की सेक्सी लग लग रही थी। उनके गीले बदन पर फ़ंसा हुआ ब्लाऊज... उफ़्फ़, उनके उरोजों को जैसे ब्लाऊज ने भींच रखा था ... ऊपर से लग रहा था कि अब निकल कर बाहर छलक पड़ेंगे। उस पर उनके कूल्हों से चिपका हुआ गीला सा पेटिकोट, उनके मस्त चूतड़ों की गहराइयों और उभारों के नक्शों को दर्शा रहा था। मेरे मुख से अनायास निकल गया,"हाय, गजब की बला है !"

"क्या कहा बल्लू ... कुछ कहना है क्या ?" मुझे उलझन में देख कर उन्होंने स्वयं ही पूछ लिया।

"मौसी, एक बात कहूँ, बहुत दिनों से मेरे मन में है !"

"हूं ... कहो ना..."

"मौसी, वो है ना ... मैं कैसे कहूँ ?"

"तुझे मेरी कसम है, बता दे !" उनके कहने के अन्दाज से मुझे लगा कि वो स्वयं ही जानती है सब बातें, पर मेरे मुख से कहलवाना चाहती हैं।

"वो ऐसा है कि मौसी ... मैं आपको प्यार करने लगा हूँ, आप मुझे बहुत अच्छी लगती हैं।"

"क्या ... क्या कहा ... बेशरम, तू मौसी से बात कर रहा है ... मौसी से ऐसे बात करते हैं?"

"पर क्या करूँ मौसी, आपको देख कर मेरा मन बहकने लगता है, रातो को मैं सो नहीं पाता हूँ।"

"मेरा नाम गंगा मौसी है, समझे ना?" और उनका एक तमाचा मेरे गाल पर आ पड़ा। मेरे तो होश उड़ गये। मेरी आशा के विपरीत उनने मुझे एक थप्पड़ मर दिया था। मेरा सर शर्म से झुक गया। मैं भारी कदमों से बाहर निकल आया। मुझे मन ही मन बहुत ग्लानि सी होने लगी। मैं अपने आप को कोसने लगा था। मेरी सूरत रूआंसी हो गई थी। मैं मामी के कमरे में जा कर लेट गया। मेरा सर भारी सा हो गया था। मुझे पता ही ही नहीं चला कि दिन के एक कब बज गये।

भोजन के लिये गंगा खुद मेरे पास आ गई। मैंने शरम के मारे उनकी तरफ़ अपनी पीठ कर ली। गंगा का प्यार भरा हाथ मेरी पीठ पर पड़ा,"नाराज हो क्या ? मुझे गुस्सा आ गया था। पर मुझे समझ में आ गया था कि यह तुम्हारा नहीं, तुम्हारी जवानी का कसूर है।"

"प्लीज मौसी, मुझे माफ़ कर दो !" मैं लजा से झुका हुआ दूसरी ओर देखने लगा था।

"अच्छा बताओ तो, तुम मेरे बारे में ऐसा क्यों सोचते हो?"

"पता नहीं, मैंने तो जब से तुम्हें देखा है, मेरे दिल में हलचल सी मचती रहती है, बस मुझसे रहा नहीं गया।"

गंगा ने मेरे सर के बालों को सहलाते हुये कहा,"अच्छा, अब सब भूल जाओ, यह बताओ कि मुझमें क्या अच्छा लगा, बताओ तो..." वो अब मेरी सूरत देख कर हंसने लगी थी। उनके इस तरह बात करने से मेरा दिल हल्का हो गया था। मैं सामान्य सा होने लगा था।

"मुझे तो आपकी हर बात अच्छी लगती है, आपकी चाल, आपका हंसना, बातें करना, और अब तो आपका गुस्सा भी...!"

मेरी बातों से वो फिर से हंस पड़ी,"देखो बल्लू, यह बात किसी से ना कहना, अपने तक ही रखना ... सच बताऊँ तो मुझे तुम बहुत प्यारे लगते हो, पर यह सब तो गलती से हो गया।"

हम दोनों ने दिन का भोजन कर लिया और वो फिर से मेरे साथ बैठ गई। हम दोनों बहुत देर तक बाते करते रहे। मैंने एक बार फिर से गंगा को पूछ ही लिया,"मौसी आपने मेरी उस बात का जवाब नहीं दिया ?"

"तुम तो बावले हो, क्या जवाब दूँ भला, यही कि तुम भी मुझे अच्छे लगते हो। बस बात अपने तक ही रखना !" मौसी हंसती हुई बोली। मैं गंगा के पास और भी सरक कर बैठ गया और उनका हाथ पकड़ लिया। पहले तो वो घबराई, फिर शान्त हो गई। उन्होंने हाथ नहीं छुड़ाया और फिर धीरे से अपना सर मेरे कन्धे पर रख दिया।

"बल्लू, तुम मुझे प्यार करोगे? ... देखो बदनाम नहीं कर देना।" उनका स्वर कहीं दूर से आता हुआ प्रतीत हुआ।

"गंगा, तुम उमर में मुझे 15-16 साल बड़ी हो मैं इसका बहुत ध्यान रखूँगा, मैं मर जाऊंगा पर तुम पर रत्ती भर भी आंच नहीं आने दूंगा !"

मैंने उनके गले में हाथ डाल कर उन्हें चूमने की कोशिश की। वो मुझे धक्का दे कर हंसती हुई भाग गई।

आखिर मेहनत रंग लाई। मैंने उन्हें पटा ही लिया। मुझे अब समझ में आ गया था कि पहल तो मर्द को ही करना पड़ता है। शाम को मामा मामी आ गये थे। अब मैं और गंगा चुपके चुपके प्यार की बातें करते थे। मौका मिलने पर मैं उनकी चूचियां भी दबा देता था। एक बार तो मैंने उनके चूतड़ दबा दिये थे ... उस समय उनकी रंगत बदल गई थी। उनमें वासना का रंग भर गया था। मामा मामी नहीं होती तो शायद गंगा उस दिन चुद जाती।

खेतों में फ़सल लहलहा रही थी। मामा मामी को शहर जाना था सो उन्होंने मुझे खेत देखने के लिये सुबह ही भेज दिया था। उस दिन बादल भी गरज रहे थे। लग रहा था कि दिन तक बरसात आ जायेगी। मेरा मन कभी गंगा मौसी की ओर भटकने लगता और कभी चम्पा चाची की तरफ़ मुड़ जाता। घर पर कोई नहीं था, मेरे लिये यह एक सुनहरा मौका था गंगा को चोदने का, पर मन मार कर खेतो की रखवाली के लिये जाना ही पड़ा। दिन के ग्यारह बज चुके थे, बादल उमड़ घुमड़ कर काफ़ी नीचे आ चुके थे, लगता था बरसात आने ही वाली है। मैंने ट्यूबवेल को बन्द कर दिया। ठण्डी हवा चल पड़ी थी, मैंने अपनी कमीज और बनियान उतार दी और ठण्डी हवा का आनन्द लेने लगा। मुझे गंगा की याद सताने लगी, काश ऐसे मौसम में वो मेरे साथ होती तो कितना मजा आता। यह सोच सोच कर ही मेरा लण्ड खड़ा होने लगा। मैंने अपनी पेण्ट भी उतार दी और चड्डी में आ गया। तभी बूंदा बांदी होने लगी। मेरे शरीर में पानी की बूंदे आग का काम कर रही थी। मैं पास ही में खेट की जमीन पर लेट गया। कीचड़ मेरे शरीर पर लिपटने लगा था।

तभी मुझे लगा कि कोई वहां आया है,"बल्लू, कहाँ हो तुम ...?"

अरे यह तो गंगा की आवाज थी, मैं अपनी सुधबुध खो बैठा और जल्दी से खड़ा हो गया। उन्होंने खाने का टिफ़िन पम्प हाऊस में रख दिया। फिर बाहर निकल आई। उस समय तक बरसात तेज होने लगी थी। मुझे देख कर वो खिलखिला कर हंस पड़ी,"अरे तुम तो कीचड़ में सन गये हो।"

"गंगा मौसी, आप भी आ जाओ ! बड़ी मस्ती आ रही है !"

गंगा ने यहाँ-वहाँ देखा, बरसात में आसपास कोई नहीं था। वो मुझे घूरने लगी। मैं भूल गया था कि मैं एक टाईट सी अन्डरवियर में नंगा खड़ा था, उस पर मेरा मोटा लण्ड उभर कर अपनी तस्वीर पेश कर रहा था। मेरे कहने पर वो भीगती हुई मेरे पास आ गई।

"तुम भी नहा लो, और यह देखो तो, तुम्हारे कपड़े तो बिल्कुल चिपक कर नीचे का नक्शा बता रहे हैं।"

"तो क्या हुआ, तुम्हारा भी तो यही हाल है, यह देखो तो कैसा जोर मार रहा है?"

मैंने उनकी बांह खींच कर उन्हें अपने से आलिंगनबद्ध कर लिया। वो शरमा गई। यूँ तो मैंने उन्हें इस तरह कई बार गले लगाया था, पर इस बार उनमें सेक्स का पुट ही था। मेरा लण्ड उनकी जांघों पर रगड़ मार रहा था। मैंने उन्हें धीरे से धरती पर लेटा दिया। उनके कपड़े भी कीचड़ से सन गये। तेज बरसात में जैसे अन्दर का ज्वालामुखी फ़ूट पड़ा। मैं उनसे लिपट पड़ा। उनके मुख से सिसकारियाँ फ़ूट पड़ी।

मैं एक एक करके उनके बदन के कपड़े उतार कर फ़ेंकने लगा। मुझे यह होश ही नहीं था कि मैं क्या कर रहा हूँ ? बस दिल की तमन्नाएँ वासना बन कर बाहर निकली जा रही थी। गंगा ने भी कोई विरोध नहीं किया, बल्कि वो तो मुझसे चिपटी जा रही थी। उनकी तेज सांसें, दिल की धक धक करती हुई धड़कनें मेरे कानों तक आ रही थी। मैंने थोड़ी सी मशक्क्त के बाद उनका शरीर से चिपका हुआ ब्लाऊज और घाघरा अलग कर दिया था। उनके शरीर पर बस ब्रा और चड्डी रह गई थी। दोनों के गुप्तांग अब एक दूसरे को रगड़ मार रहे थे।

"बल्लू, तुझे मेरी कसम जो तूने किसी को कुछ कहा तो !" उनके भीगे हुये स्वर ने मुझे भी गहराई तक झकझोर दिया।

"मेरी गंगा, बस कुछ मत बोल, तू सिर्फ़ मेरी है, अब जो होना है होने दे।"

"मैं मर जाऊंगी, मेरे राजा।"

"आह, तेरी चड्डी जब हटेगी तब मैं भी मर जाऊंगा।"

"नहीं मेरे राजा, नहीं, बस जी भर कर मुझे प्यार कर ले, मुझे शान्ति दे दे।"

मैंने धीरे से उनकी चड्डी नीचे सरका दी। वो एक दम बल खा गई। अपनी चड्डी को फिर से ऊपर चढ़ाने लगी। मैंने उनका हाथ पकड़ कर ऊपर कर दिया और उसे दबा लिया। हम दोनों कीचड़ में बुरी तरह से लथपथ हो गये थे। मेरा लण्ड बाहर निकल कर उसकी चूत की दरार को ढूंढने में लगा था। मैंने उनके होंठ दबा दिये और लण्ड ने अपना साथी तलाश लिया। चिकना छेद पाकर लण्ड चूत में उतर गया।

"नहीं बल्लू, मत करो, मैं मर जाऊंगी !"

"नहीं करूंगा तो मैं मर जाऊंगा... मेरी रानी।"

मेरा लण्ड एक मिठास भरी गुदगुदी के साथ अन्दर घुस गया। उनके मुख से एक मीठी सी आह निकल गई और उनने मुझे भींच लिया। उनकी कसकती आवाज मेरे दिल को घायल कर रही थी।

"ओह्ह, कितने सालों बाद नसीब हुआ है !"

"रानी अब तो रोज नसीब होगा... बस खेत याद रखना।"

कीचड़ से सने हुये हम दोनों काम-क्रीड़ा में लिप्त होते जा रहे थे। मुझे तो जैसे मन मांगी मुराद मिल गई थी। मेरे सपनों की रानी मेरे नीचे दबी चुद रही थी। मैं दिल लगा लगा कर उनके जिस्म से खेल रहा था। उनकी कीचड़ से भरी चूचियां मुझे उत्तेजित करती जा रही थी। मेरी कमर हिलते हुये लण्ड को अन्दर-बाहर करने में मेरी पूरी सहायता कर रही थी। उने भी नहीं नहीं पता था कि उनके कीचड़ में क्या हाल हो रहे हैं। जहा मैं गंगा को चोद रहा था उस स्थान पर पानी भर गया था। बरसात जम कर हो रही थी। उसकी बौछारें मेरे तन पर गिर कर शोला बन रही थी। कभी वो मेरे ऊपर आ जाती थी और कभी मैं उनके ऊपर आ जाता था। जमीन के कीचड़ भरा पानी से हम दोनों सन गये थे।

उनकी चूत गहराई तक चुद रही थी। उनकी मस्ती भरी चीखें बारिश की झमाझम में मुझे और उत्तेजना दे रही थी जैसे कोई बाढ़ सी आ गई हो। नीचे गंगा तड़प सी उठी थी।

"बल्लू, मेरे राजा, बस मैं तो जी भर के चुद गई, मैं तो गई।"

कहते कहते गंगा ने अपना कामरस छोड़ दिया। वो झड़ने लगी। उनके गाल कठोर हो गये, दांत भिंच गये, आंखे जोर से बंद कर ली। उनका चेहरा बनने बिगड़ने लगा। वो अपना रज निकालने में लगी थी, वो झड़ने का अपूर्व आनन्द ले रही थी। तभी मेरा लण्ड भी और कठोर हो गया और उनकी चूत में गड़ गया। मुझे पता चल गया था अब मैं भी गया। मैंने तुरन्त लौड़ा बाहर निकाल लिया और गंगा ने उसे मुठ में दबा लिया और मेरा वीर्य लण्ड से बाहर उछल कर बाहर निकलने लगा। लण्ड में से वीर्य निकलता देख कर वो भी निहाल हो गई।

"कितने दिनों के बाद मैंने एक जवान लण्ड का वीर्य उछल कर बाहर निकलते देखा है... हाय राम रे !"

झरने के बाद मैं भी छपाक से पानी के कीचड़ में गिर पड़ा और गहरी गहरी सांसें लेने लगा।

"अरे देखो तो हमारा क्या हाल हो गया है... ये कीचड़ ही कीचड़..." वो हंस पड़ी।

मैंने उन्हें अपनी बांहों में उठाया और नलकूप की टंकी में पटक दिया। साथ ही उनके कपड़े भी उसमें डाल दिये। फिर मैं भी उस टंकी में उतर गया।

बारिश में हम दोनों नंगे ही उसमें नहाये और भाग कर पम्प हाऊस में आ गये। हम दोनों ने अपने कपड़े पहन लिये, फिर बैठ कर भोजन कर लिया। मैं तो आज बहुत खुश था। गंगा भी आज चुद कर मस्त हो गई थी। मेरे मन के मीत को मैंने आज जी भर कर मनमाने तरीके से चोदा था, मन बहुत हल्का हो गया था।

गंगा की खुशी का तो ठिकाना ना था। उन्होंने भी आज एक जवान और मोटे मस्त लण्ड से चुदवा कर आनन्द लिया था। उनकी नजरें कह रही थी कि अभी बारिश समाप्त नहीं हुई, तो हमारी चुदाई क्यूँ रुक गई है ? फिर गंगा मौसी का मौन इशारा पा कर कुछ ही क्षणों में हमने खड़े खड़े चुदाई आरम्भ कर दी थी, पर हां ... इस बार मौसी की गाण्ड चुद रही थी ...।

नेहा वर्मा


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