Uski-Khud-Ki-Fat-Gai
Search File :





भाभी की चुदाई की बेकरारी

Size : 13 KB
Type : php
उसकी खुद की फट गई ! , uski-khud-ki-fat-gai, Hindi Sex Stories


Hindi Sex Stories


उसकी खुद की फट गई !

सभी अन्तर्वासना पढ़ने वालों को मेरा यानि हरीश का प्रणाम, गुरु जी को भी मेरा नमस्कार ! यह मेरी अन्तर्वासना पर पहली पहली कहानी है और सनी भाई का बहुत बहुत सारा शुक्रिया जिनकी बदौलत मेरी गांड की प्यास बुझ गई।

सनी भाई आपकी मैंने अब तक की सभी कहानियाँ पढ़ी हैं, पहले मुझे यकीन नहीं आता था लेकिन जिस दिन मैंने आपको वेबकैम पर लाइव गांड मरवाते देखा मुझे यकीन हो गया।

दोस्तो, मुझे भी गांड देने का चस्का लग गया था मेरे हाव-भाव भी पूरे लड़की जैसे हैं, हाँ, मम्मे सनी भाई जितने नहीं हैं लेकिन मेरी गांड बिल्कुल गोल है जिसे नंगी देख किसी का भी उसी पल उसमें लौड़ा घुसाने का दिल करेगा। लेकिन मैं पहले बहुत डरता था, मेरी हालत भी सनी भाई जैसी थी।

मेरी गाण्डू बनने की शुरुआत ऐसे हुई थी-

मैं अपने एक टयूशन-टीचर के लौड़े का छोटी उम्र में शिकार बना। सनी भाई को तो अपने पापा के दोस्त से आदत पड़ी, उनकी भी पत्नी नहीं थी और मेरे सर की भी पत्नी का देहांत हो गया था। पहले वो मुझसे मुठ मरवाते थे लेकिन फिर मुझे चूसने को कहने लगे और फिर एक दिन ठोक दिया मेरी गाण्ड में अपना मोटा सा लण्ड ! मुझे बहुत दर्द हुआ लेकिन फिर रोज़ मेरी गांड मारते, जिससे मुझे यह आदत पड़ गई, फिर मैं खुद लौड़े का शौकीन हो गया और उन्हें तरह तरह से मजे देता और लेता।

उसके बाद सर अपने बच्चों के पास अमेरिका चले गए मुझे रंडी करके ! वो मुझे अपनी पत्नी की तरह करते थे- लड़कियों वाले कई तरह के सेक्सी कपड़े मुझे पहना-पहना कर मेरे साथ आये दिन सुहागरात मनाते थे और जिस तरह उनकी पत्नी नहीं रही थी, अब मुझे लगने लगा कि मेरा पति नहीं रहा।

लेकिन मुझमें इतनी हिम्मत थी कि किसी से कहूँ अपनी गांड मारने को ! फिर देनदार हूँ मैं अन्तर्वासना का जिसकी वजह से मुझे सनी भाई मिले और उनकी कहानियाँ पढ़ कर मुझ में पूरी हिम्मत आ गई और आखिर एक दिन मैंने सोच लिया कि अब मैं प्यासा नहीं रहूँगा, किसी न किसी को अपनी जिंदगी में लाऊंगा और उससे नाजायज़ रिश्ते बनाऊंगा।

लेकिन कैसे ? कैसे ? कैसे ?

अब मैंने भी सनी भाई की तरह प्रवासी मजदूरों की तरफ कदम बढ़ाने की सोच ली और शाम को सैर के लिए निकलने लगा। जैसे अँधेरा होना शुरु होता, मैं वापिस आते वक़्त झुग्गी-झोंपड़ी वाले इलाके से गुज़रता, गाण्ड हिला-हिला कर चलता, किसी मर्द को प्यासी नज़रों से देखता, कभी अपने होंठ काट कर, कभी होंठों पर जुबान फेर कर !

एक शाम को मेरी मेहनत रंग ला ही रही थी कि काम बिगड़ गया।

प्रवासी मजदूर तो नहीं था वो, वो कोई बढ़ई था, अपना काम करके घर लौट रहा था और सिगरेट पीने की लिए बाग वाली खाली जगह आ गया। मैंने उस पर लाइन मारी और वो समझ भी गया। मैंने उसकी ओर हवा में चुम्बन उछाल कर अपने पीछे आने का इशारा किया और आगे जाकर एक झाड़ी के पीछे बैठ गया। यह कहानी आप अन्तर्वासना डॉट कॉम पर पढ़ रहे हैं।

वो वहाँ आया, बोला- क्या बात है? क्या चाहता है ?

लौड़ा !

गांड देनी है !

लौड़ा चूसना है तेरा !

मैं बैठा रहा, वो मेरे पास आया, मैंने उसी वक़्त उसकी जिप पर से उसके लौड़े को मसल दिया। सोया हुआ लौड़ा था, जैसे जैसे मैं मसलता गया, उसका खड़ा होने लगा और फिर मैंने ज़िप खोल कर उसका लौड़ा पैंट से बाहर निकाल लिया और चूसने लगा।

उसने मेरे सर को पकड़ लिया और जोर जोर से हिलाने लगा। उसका ज्यादा बड़ा नहीं तो था, मैं पूरा मुँह में लेकर फ़िर बाहर निकालता ! उसने कभी चुसवाया नहीं था, उसने बिना बताये ही अपना पानी मेरे मुँह के अंदर ही निकाल दिया। उस वक़्त उसका पूरा लौड़ा मेरे मुँह में था, मैंने कभी मुँह में नहीं पानी लिया था।

पागल है क्या ?

बता तो देता !

वो बोला- बेनचोद ! मुझे होश था क्या ? साले खुद बुलाया तूने मुझे ! मैं चलकर नहीं गया घर तेरे !

वैसे इतना बुरा स्वाद भी नहीं था !

कुछ देर बाद सोये हुए लौड़े को मैं फ़िर चूसने लगा और जब उसका खड़ा हुआ तो मैंने अपनी गांड उसकी तरफ घुमा दी और घोड़ी बन गया।

उसने अपना लौड़ा रख थोड़ा धक्का मारा।

मेरी फटने लगी क्योंकि काफी दिनों बाद डलवा रहा था। लेकिन मैं सहने लगा, मजा आया !

हाँ डालो !

और उसने दूसरे धक्के में पूरा घुसा दिया !

और अभी रगड़ने लगा ही था कि किसी ने कहा- कौन है वहाँ पर ?

वो मेरी गांड तो फाड़ रहा था, उसकी खुद की फट गई !

वो पैंट ऊपर करके भाग गया वहाँ से !

मैं क्या करता ?

मैं तो चुदाई के लिए इतना पागल हो गया था कि जैसे अपने बेडरूम में मरवा रहा था, अपनी पैंट उतार कर एक तरफ़ रखी हुई थी, कैसे भागता ?

इससे पहले मैं पैंट उठाता, उस बंदे ने मेरी पैंट उठा ली।

वाह मेरे लाल ! क्या करवा रहा था उससे ?

क्या चिकनी है तेरी !

उसका चेहरा देखा, काला रंग, बड़ी बड़ी दाड़ी-मूंछें !

कोई मजदूर ही था। उसके साथ उसके जैसा ही एक और बंदा था। वो भी वैसा ही था।

उसने कहा- मरवा ली थी या फिर बीच में छोड़ भाग गया साला?

उसने मेरी गांड पर हाथ फेरा, मुझे अजीब सा मजा आया।

वो बोला- गांड बहुत ज़ालिम है तेरी ! चुदवायेगा मेरे से ? मतलब हम दोनों से ?

मैं क्या कहता उसको !

गांड मरवाने के लिए तो वहाँ आना शुरु किया था।

दूसरे ने पास आकर मेरे चूतड़ फैला कर छेद देखा, बोला- वाह ! सही मोरी है गांडू की !

उसने उंगली घुसा कर देखा, बोला- लगता है घुसा हुआ निकाल लिया उसने !

मैंने कहा- हाँ, प्यासी छोड़ दी उसने !

हम हैं ना ! चल हमारे कमरे में ! पास में है, गांडू, यहाँ मत मरवाया कर ! यहाँ पुलिस वाले आम घूमते हैं क्योंकि यहाँ अमीर घर की औरतें अपनी चूत ठंडी करवाने लड़के लेकर आती हैं और फिर पकड़े जाने पर मोटी रकम देती हैं !

समझा?

ठीक है ! चलो !मैं उनके साथ निकल पड़ा।

पास में ही था उनका कमरा !

जब मैं उनके साथ वहाँ पहुंचा तो वहाँ क्या क्या हुआ!!!

जानने के लिए अन्तर्वासना पढ़ते रहो !

यह मेरी पहली दास्ताँ है और अब तो मैं अपनी एक एक चुदाई सबको बताऊंगा।

सबका प्यारा गांडू हरीश


[<<]Home



DOWNLOAD